Sunday, 1 March 2015

इस ग्रंथ पर भगवान शिव ने किए थे हस्ताक्षर लिखा था- सत्यं शिवं सुंदरम्

इस ग्रंथ पर भगवान शिव ने किए थे हस्ताक्षर
लिखा था- सत्यं शिवं सुंदरम्
 
इस ग्रंथ पर भगवान शिव ने किए थे हस्ताक्षर
धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी (इस बार 7 दिसंबर, शनिवार) को भगवान श्रीराम का विवाह सीता से हुआ था और इसी दिन गोस्वामी तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस को पूर्ण लिखी थी। श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम के जीवन का अद्भुत और सुंदर वर्णन मिलता है।
1- श्रीरामचरितमानस के लेखक गोस्वामी तुलसीदास थे| इनका जन्म संवत् 1554 में हुआ था। जन्म के समय बालक तुलसीदास रोए नहीं थे बल्कि उनके मुख से राम शब्द निकला। इसी से ही उनका नाम रामबोला पड़ा | जन्म से ही उनके मुख में 32 दांत थे। काशी में शेषसनातनजी के पास रहकर तुलसीदासजी ने सालों तक वेद-वेदांगों का ज्ञान प्राप्त किया |
2- संवत् 1583 में तुलसीदासजी का विवाह हुआ। वे अपनी पत्नी से बहुत प्यार करते थे। एक बार जब उनकी पत्नी अपने पीहर गईं तो पीछे-पीछे ये भी वहां पहुंच गए। पत्नी ने जब देखा तो उन्होंने तुलसीदासजी से कहा कि जितना तुम्हरा मुझमें ध्यान है, उससे आधा भी यदि भगवान में होती तो तुम्हारा कल्याण हो जाता। पत्नी की यह बात तुलसीदासजी को चुभ गई और उन्होंने गृहस्थ आश्रम त्याग दिया व साधुवेश धारण कर लिया।
3- एक रात तुलसीदासजी सो रहे थे तो उन्हें स्वप्न आया। सपने में भगवान शिवजी ने उन्हें आदेश दिया कि अयोध्या में जाकर रहो और हिंदी में काव्य रचना करो। मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान फलदायक होगी। भगवान शिव की आज्ञा मानकर तुलसीदासजी अयोध्या आ गए।
4- संवत् 1631 को रामनवमी के दिन वैसा ही योग था जैसा त्रेतायुग में रामजन्म के समय था। उस दिन तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारंभ की। 2 वर्ष, 7 महीने व 26 दिन में ग्रंथ की समाप्ति हुई। संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाह के दिन इस ग्रंथ के सातों कांड पूर्ण हुए और भारतीय संस्कृति को श्रीरामचरितमानस के रूप में अमूल्य निधि प्राप्त हुई।
5- यह ग्रंथ लेकर तुलसीदासजी काशी गए। रात के समय तुलसीदासजी ने यह किताब भगवान विश्वनाथ के मंदिर में रख दी। सुबह जब मंदिर के द्वार खुले तो उस पर लिखा था- सत्यं शिवं सुंदरम्। और नीचे भगवान शंकर के हस्ताक्षर थे। उस समय उपस्थित लोगों ने सत्यं शिवं सुंदरम् की आवाज भी अपने कानों से सुनी।
6- अन्य पंडितों ने जब यह बात सुनी तो उनके मन में तुलसीदासजी के प्रति जलन होने लगी। उन्होंने दो चोर श्रीरामचरितमानस को चुराने के लिए भेजे। चोर जब तुलसीदासीजी की कुटिया के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि दो वीर धनुष बाण लिए पहरा दे रहे हैं। वे बड़े ही सुंदर और गौर वर्ण के थे। उनके दर्शन से चोरों की बुद्धि शुद्ध हो गई और वे भगवान भजन में लग गए।
7- एक बार पंडितों ने श्रीरामचरितमानस की परीक्षा लेने की सोची। उन्होंने भगवान काशीविश्वनाथ के मंदिर में सबसे ऊपर वेद, उनके नीचे शास्त्र, शास्त्रों के नीचे पुराण और सबसे नीचे श्रीरामचरितमानस ग्रंथ रख दिया। मंदिर बंद कर दिया गया। सुबह जब मंदिर खोला तो श्रीरामचरितमानस वेदों के ऊपर रखा हुआ था | यह देखकर पंडित लोग बहुत शर्मिंदा हुए। उन्होंने तुलसीदासजी से क्षमा याचना की और श्रीरामचरितमानस के सर्वप्रमुख ग्रंथ माना।
8- इस ग्रंथ में रामलला के जीवन का जितना सुंदर वर्णन किया गया है, यही कारण है कि श्रीरामचरितमानस को सनातन धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। रामचरित मानस में कई ऐसी चौपाई भी तुलसीदास ने लिखी है जो विभिन्न परेशानियों के समय मनुष्य को सही रास्ता दिखाती है तथा उनका उचित समाधान भी करती हैं।
क्या है महादेव से जुड़ी 8 रहस्यमय बातें?
 
क्या है महादेव से जुड़ी 8 रहस्यमय बातें
धर्म शास्त्रों के अनुसार प्रकृति में ही भगवान शिव का रूप समाहित है। सभी देवता भगवान शिव के आदेशानुसार ही कार्य करते है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव पूरे संसार में 8 रूपों में समाए हुए है। भगवान शिव के 8 रूप शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव है।
शिव के ये 8 रूप 8 मूर्तियों द्वारा भूमि, जल, अग्रि, वायु, आकाशक्षेत्रज्ञ, सूर्य और चन्द्रमा को नियंत्रित करते है। भगवान शिव के इन 8 रूपों से जुड़ी 8 रहस्यमय बातें इस प्रकार है -
शर्व
यह पूरे संसार को धारण करने वाले पृथ्वीमयी मूर्ति के स्वामी है। इसे शिव की शार्वी प्रतिमा भी कहा जाता है।
भीम
यह भगवान शिव की आकाशरूपी मूर्ति है। जो बुरे और तामसी गुणों का नाश कर संसार में सुख-समृद्धि देने वाली मानी जाती है। इस मूर्ति के स्वामी भीम है और यह भैमी नाम से प्रसिद्ध है।
उग्र
यह वायु रूप में पूरे संसार को गति प्रदान करती है और पालन-पोषण करती है। इस मूर्ति के स्वामी उग्र है और यह औग्री के नाम से प्रसिद्ध है।
भव
शिव की यह जल से युक्त मूर्ति पूरे संसार को प्राणशक्ति और जीवन देती है। इसके स्वामी भव है और यह भावी नाम से रौद्री नाम से प्रसिद्ध है।
रुद्र
यह भगवान शिव की ओजस्वी मूर्ति है, जो समस्त संसार के अंदर-बाहर फैली ऊर्जा व गतिविधियों में स्थित है। इसके स्वामी रूद्र है और यह रौद्री नाम से प्रसिद्ध है।
पशुपति
यह मूर्ति सभी आत्माओं की नियंत्रक है। यह संसार में पशु यानी दुर्जन वृत्तियों का नाश करती है और उनसे मुक्ति दिलाती है।
ईशान
यह सूर्य रूप में आकाश में चलते हुए संपूर्ण संसार को प्रकाशित करती है।
महादेव
यह चन्द्र रूप में शिव की साक्षात मूर्ति है। चन्द्र रूप में शिव की यह मूर्ति महादेव के रूप में प्रसिद्ध है।
भगवान शिव की पूजा ही पूरे प्रकृति की पूजा है। सभी की भलाई, मदद या उपकार करना ही शिव की वास्तविक पूजा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार संसार में सुख-समृद्धि होने पर ही भगवान शिव प्रसन्न होते है।
विशेष मंत्र से तोड़ा गया फूल शिवलिंग पर चढ़ाने पर धन की प्राप्ति होगी
विशेष मंत्र से तोड़ा गया फूल शिवलिंग पर चढ़ाने पर धन की प्राप्ति होगी

हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार पेड़-पौधों में भी देवताओं का वास होता है और यह पूजनीय माने जाते है। इन पेड़-पौधों की पूजा करने पर और इनसे प्राप्त फूल-पत्तों को देवताओं पर चढ़ाने पर विशेष लाभ प्राप्त होता है।
भगवान शिव को भी फूल-पत्ते चढ़ाने पर मंगलकारी फल प्राप्त होता है। परंतु इन फूलों को शिवलिंग पर चढ़ाने से पहले तोड़ते समय विशेष मंत्रों का जप बताया गया है। पेड़-पौधों से फूल को तोड़ने से पहले इस विशेष मंत्र का जप करें उसके पश्चात शिवलिंग पर इस तोड़ें गये फूल को चढ़ाएँ। ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहेगी और विशेष धन लाभ होगा।
फूल तोड़ने से पहले स्नान करके आचमन करें। इसके पश्चात हाथ जोड़कर पूर्व दिशा की ओर मुँह करके इस मंत्र का जप करते हुए फूल तोड़ें।
मा नु शोकं कुरुष्व त्वं स्थानत्यागं च मा कुरु।
देवतापूजनार्थाय प्रार्थयामि वनस्पते।।
हिंदू धर्म शास्त्रों में यह भी विधान है कि पहला फूल तोडने पर ऊँ वरुणाय नम:, दूसरा फूल तोड़ते समय ऊँ व्योमाय नम: और तीसरा फूल तोड़ते समय ऊँ पृथिव्यै नम: मंत्र का जप करें।
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सभी धर्म प्रेमियोँ को मेरा यानि पेपसिह राठौङ तोगावास कि तरफ से सादर प्रणाम।
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